मिस. रामप्यारी के ब्लाग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

Saturday, May 30, 2009

ये लो जी रामप्यारी एक्सप्रेस आगई २:३० पर

हां तो मैने पिछली पोस्ट मे बताया था कि हम लोग वहां पर पेड की छांव मे लेट गये थे. फ़िर क्या हुआ कि हम जब उठे ना तो वहां पर हमको बहुत सारे साधू बाबाजी जैसे लोग घूमते दिखाई दिये.

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फ़िर मैने भी वहां जाकर उन लोगों से बात की. वो तो बाहर के देशों से आये हुये लोग थे. फ़िर उन लोगों से बात की और घूम कर हम लोग वापस अपने होटल आगये और अगले दिन हम वापस रवाना हो गये.

और आपने समीर अंकल की पहेली का जवाब दिया कि नही? मेरा नाम मत बताना अंकल को. उन्होने क्या किया है कि तीन ब्लागरों के चेहरे मिला दिये और पहेली बना दी. अब इतना क्ल्यु मैने आपको अंकल की पहेली का भी देदिया. फ़टाफ़ट जाकर जवाब देकर आवो आप तो.

अब रामप्यारी की रामराम.

आगई..आगई….रामप्यारी हिंट लेकर आगई.

नमस्ते आंटियों , अंकलों और दीदीयों.

अब क्या हुआ ना कि एक दिन ताई ने बिना बात मेरी शिकायत लगा दी ताऊ से. बस अब तो ताऊ शुरु होगया लेक्चर देने. बस रामप्यारी का दिमाग खाली करके रख दिया बिना बात में

ताऊ बोला – रामप्यारी तुझको सब कुछ बिना मांगे मिल जाता है तो तू सिर्फ़ बदमाशी करती है. इतने अच्छे स्कूल मे तेरे को एडमिशन करवा दिया डोनेशन देकर. तो तेरे को एहसास नही है कि कैसे एडमिशन होते हैं आजकल.

बस इतना कहना था कि ताई बीच मे बोल पडी कि आजकल ही क्या? पुराने समय मे हमारे भारत मे दुसरे देशों से भी छात्र पढने आया करते थे. और उस जमाने मे भी उनको तीन तीन परिक्षाएं पास करनी पडती थी तब कहीं जाकर उनको एडमिशन मिलता था.

फ़िर दोनों मे हमेशा की तरह चख चख होने लग गई. मेरा नाम मत बताना कि मैने आपको ये बताया है. फ़िर हम एक बार वहां घूमने भी गये थे.

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मुझे तो ऐसा मजा आया की क्या बताऊं? मैं तो उन इमारतों पर खूब उछली कूदी और खूब धमाचकौडी मचाई जब तक ताई ने मुझको डांटकर बैठाया नही.

ताई बोली रामप्यारी अब आराम से बैठ जा . नही तो रात को बोलेगी मेरे पांव दुख रहे हैं. और मैं खुद भी थक गई हूं इतनी बडी जगह मे घूम घूम कर. तो रात को मैं तेरे पावों मे तेल लगाने वाली नही हूं.

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बस फ़िर हम वहां बगीचे मे ठंडी चांव मे इन पेडों के नीचे लेट गये. और मुझे तो वहां ऐसी नींद आई कि पूछो ही मत.

और एक आज की खास खबर बताऊं? अभी तक तो ताऊ और अल्पना आंटी ही पहेली पूछा करते थे. अब वो अपने समीर अंकल हैं ना..अरे बाबा वही अपने उडनतश्तरी वाले समीर अंकल.

हां तो अब उन्होने भी पहेली पूछनी शुरु करदी है. सच्ची मैं झूंठ नही बोल रही हूं. विद्या माता की कसम. आप चाहो तो जाकर देख लो. मैं तो सबसे पहले सही जवाब भी देकर आगई. आप भी जाकर मेरे जवाब की नकल मार लो. आप भी जीत जाओगे.

Saturday, May 23, 2009

रामप्यारी हाजिर है २ : ३० PM पर

ये लो जी, आज तो रामप्यारी दुबारा हाजिर होगई एक ही दिन मे.  ढाई बजे नही कि रामप्यारी आगई.

अब रामप्यारी आई है तो कुछ तो बोलना ही पडेगा ना?

 

अब क्या हुआ कि हम उस पहेली वाली जगह गये थे तो वहां एक नदी भी है और वहं पर यह नीचे वाला बोर्ड लगा हुआ है.  अब इस पर पता नही कौन कौन सी भाषा लिखी हुई है..मैं तो समझती नही. सो मैं तो नदी मे उतरने लग गई. 

 

 

 

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और बस मैं उतरी भी नही थी कि ताऊ जोर से चिल्लाया….रामप्यारी की बच्ची…डूब कर मरना है क्या?चल बाहर निकल…और मैं तो बाहर आगई.  और सच्ची उस बोर्ड पर मना किया गया था नदी मे उतरने के लिये.

 

फ़िर हम वहां से वापसी मे कार से निकले. रास्ते मे खूब सारे काफ़ी के बगीचे थे. और एक जगह हमने डाल्फ़िन की नाक भी देखी.

 

अब आप कहोगे…रामप्यारी ये क्या गप्पें हांकने लग गई?  तो हां मैं थोडी बहुत गप्प तो हांकती हूं..क्योंकि आज के जमाने मे गप्प हांके बिना काम नही चलता.

 

अब आप कहोगे कि रामप्यारी ये डाल्फ़िन की नाक तूने कहां से देख ली?

 

अरे..आप भी ना…समझते नही हो..कोई सच्ची मुच्ची की डाल्फ़िन थोडी ही थी वो?  अरे चट्टान थी वो जिसे डाल्फ़िन की नाक कहते हैं  और रास्ते मे ही पडती है.  और भी बहुत सी जगह देखी.

 

अब मैं तो खाना खाकर सोऊंगी…गर्मी  बहुत ज्यादा है….अब रामप्यारी कल रिजल्ट लेके हाजिर होगी आपकी सेवा मे. तब तक रामराम.

आगई..आगई..रामप्यारी हिंट ले के आगई.

नमस्ते आंटीयों, अंकलों और दीदीयों.


अभी कुछ समय पहले मैं ताऊ के साथ गई थी हैद्राबाद. वहां पर मैने एक बहुत बडा म्युजियम देखा. उस म्युजियम का नाम था सालारजंग म्युजियम. और अंकल उसमे ऐसी ऐसी चीजे देखी की कि अब मैं आपको बताने बैठी तो आपके क्ल्यु तक पहुंच पाना ही मुश्किल हो जायेगा.


मेरे को वहां की एक चीज जरुर याद है. वहां एक घडी यानी दीवार घडी थी. जब भी घंटा पूरा होता उसमे से एक आदमी निकल कर आता और हथौडा उठाकर जितने बजे हों उतने घंटे बजाता. मुझे तो इस खेल मे बहुत मजा आया. ताऊ और ताई तो पता नही वहां घूम घूम कर क्या क्या देखते रहे. पर मैं तो सारे समय इसी के मजे लेते रही.


अब हम हैद्राबाद से विशाखापट्टनम चले गये. और वहां से इस जगह के लिये ट्रेन से निकले. करीब होगी यही कोई ५ या छ घंटे की यात्रा. आहा…कितना मजा आया इस यात्रा मे? हमारी रेलगाडी रास्ते मे इतने पुलों पर से गुजरी की क्या बताऊं? और बोलो…कम से कम आधा सैकडा गुफ़ाएं भी पडी थी. जिनमे से होकर हमारी रेलगाडी गुजरी थी. बस मुझे तो मजा आगया.



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फ़िर इन गुफ़ाओं से निकल कर हमारी गाडी एक स्टेशन पर पहुंची..पता नही स्टेशन का क्या नाम था? अब स्टेशन था तो कुछ नाम भी होना चाहिये? हां शायद कोई सा गुहालू या वुहालू ..ऐसा ही कुछ नाम था उस स्टेशन का. आप चिंता मत करो. मैं याद करके अगली पोस्ट मे २:३० बजे आपको बता दूंगी.


अब हम वहां से सीधे पहुंच गये इन गुफ़ाओं मे.

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और हां..इन गुफ़ाओं मे करीब ३५० सीढियां उतरनी पडती हैं. और फ़िसलन भी बहुत ज्यादा. मैं तो एक बार फ़िसल ही गई थी. पर अंकलों और आंटियों फ़िसलने से रामप्यारी को कोई फ़र्क नही पडता. पर आप जरा देखकर …बुढ्ढे अंकलों और आंटियों आप माफ़ करना…अगर इस उम्र में हड्डी चटक गई तो फ़िर जुडने वाली नही है. फ़िर कहते फ़िरोगे कि ये रामप्यारी भी कहां कहां घुमाती रहती है? शाश्त्री अंकल आप सुन रहे हैं ना? और ताऊ को भी समझा देना.


अब अगले बुलेटिन मे २ :३० बजे रामप्यारी आपको फ़िर मिलेगी.

तब तक के लिये रामराम.

Saturday, May 16, 2009

रामप्यारी की रामराम

रामप्यारी की रामराम.

हाय आंटीज, अंकल्ज एंड दीदी लोग..वैरी गुड एंड शक्कर जैसी  स्वीट स्वीट वार्म मार्निंग फ़्राम रामप्यारी…कैसे हैं आप लोग?  ये ल्लो..मैं भी क्या पगला गई हूं?..जब आप लोग यहां रामप्यारी के ठीये तक आ ही गये हैं तो अच्छे ही होंगे ना?  कोई बीमार तो रामप्यारी के ठीये तक कैसे आयेगा?

 

और हां अंकल आंटियों और दादीयों…आप ना ..आप ना…हिंट तो मुझसे लेते हैं और मुझे यहां थैंक्यु भी बोल कर नही जाते.  अब आप इतने बडे हैं ..मैं आपको क्या समझाऊं कि थैंक्यु तो कहना ही चाहिये कि – रामप्यारी..तूने हिंट दिया..तेरा थैंक्यु..पर नही आप तो सीधे भाग लेते हो? 

 

देखना..कभी रामप्यारी का दिमाग घूम गया तो हिंट ऐसा देगी कि आपको हिमाचल से सीधे कन्याकुमारी पहुंचा देगी.  हां नही तो क्या?

 

अरे यार हीरामन भैया..आप क्यो चिल्ला रहे हो?  अरे आई ..आई….बस सबको रामप्यारी ही दिखती है..कुछ भी काम हो…अब हिंट देना है तो रामप्यारी देगी…ताऊ तो आराम से बैठ कर चुनाव नतीजे सुनने मे लगे हैं.  

 

ताई को कुछ काम हो तो रामप्यारी..रामप्यारी…और अब ये हीरामन भैया…अब एक अकेली जान ..रामप्यारी ..क्या क्या करे?  हां अब बोलो हीरामन भैया..आपको क्या तकलीफ़ है? क्युं चिल्ला रहे हो?

 

अब हीरामन भैया बोले  –  रामप्यारी..देख  आज तेरा भविष्य मुझे खराब दिखाई पड रहा है…मैने पूछा कि ऐसे क्या पत्थर पड गये मेरे भविष्य मे? और मैने कौन सा पाप कर दिया?

 

हीरामन भैया बोले – देखो उपर तुमने दीदीयों को दादीयों लिख दिया है और आज तेरी डाक्टर पूजा दीदी और लवली दीदी दोनों ही  तेरी आरती उतारेंगी.

 

अरे बाप रे…सारी.  वैरी वैरी सारी….दीदीयों..माफ़ करना प्लिज…जरा जल्दी मे मेरी जबान फ़िसल गई थी.  अब आप तो जानती ही हो कि मैं कोई जान बूझकर ऐसा थोडी बोल सकती हूं.

 

हां तो मैं पिछले साल ताऊ और ताई के साथ घूंमने गई थी…वहां पर हमारा होटल..बिल्कुल नदी के किनारे ही था. और वहीं से इस जगह  हम पैदल ही चढ गये थे.  और उपर ना….वहां मेला जैसा लगा हुआ था…चकरी वाला झूला और भी पता नही क्या क्या…मैने तो खूब आनन्द लिये. और बहुत भीड थी वहां पर.

 

और ताऊ और ताई  तो वहां पर ना…वहां की लोकल ड्रेस पहन कर फ़ोटो  खिंचवा रहे थे.  अब मैं वो फ़ोटो आपको तो नही दिखा सकती ना..वर्ना मेरी पिटाई होने की संभावना बढ जायेगी.

 

 

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यहां रामप्यारी को ढूंढिये

 

आप तो ये वाली फ़ोटो देखो और मुझे ढूंढो इसमे.  और इस जगह बहुत सारे पेड भी थे.  और मंदिर का दरवाजा थोडा छोटा था. मैं तो फ़ट से घुस गई थी पर ताऊ को थोडी तकलीफ़ हुई थी.

 

और एक बात बताऊं?  किसी से कहना मत..ताऊ ना…ताऊ ना…अहले तो ४थी क्लास मे फ़ेल हुआ…फ़िर ना..फ़िर ना…फ़िर ना ११ वीं मे फ़ेल होगया..और उसके बाद  १७ वीं क्लास मे फ़ेल होगया…और मुझको कहता है- रामप्यारी तू कितनी बडी डफ़र है…दुसरी क्लास मे दो दो बार फ़ेल हो चुकी है?

 

अब बोलो डफ़र मैं हूं या ताऊ?  अरे मैं तो दूसरी क्लास मे ही फ़ेल होती हूं..तुम तो १७ वीं मे फ़ेल होते हो? तो कौन बडा डफ़र है? जो बडी क्लास में फ़ेल होता है वो बडा डफ़र होगा ना. सीधी सी तो बात है.

 

अरे अब आप ये पूछना चाहते हैं ना कि रामप्यारी – ये १७ वीं क्लास कौन सी होती है?  अरे अब आप समझा करो..ताऊ और रामप्यारी के यहां कुछ भी हो सकता है.

 

हां जब हम वहां गये थे ना तब बहुत भयानक वाली गर्मी थी. जैसी आजकल है.  रास्ते मे हम ताई के मायके मे भी रुके थे. मुझे याद आरहा है.  और एक जगह ना हमारी कार गर्म हो गई थी..अब उस जमाने की कारें आज जैसी तो होती नही थी.

 

कार चलाने वाला ताऊ और फ़िर ताऊ थक जाता तो ताई चला लेती थी.  हां एक बात ये दोनों और कोई काम ढंग का करें या ना करें ..पर ये दोनों कार चलाने का काम बहुत बढिया कर लेते हैं. मैं तो इनके साथ साथ करीब करीब पूरा भारत कार से घूम चुकी हूं...

 

 

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तपती दोपहर पिलानी से बाहर एक गांव में

 

रास्ते मे पिलानी से निकलते ही एक जगह हमको कुछ ऊंट और उनके बच्चे एक पेड के नीचे बैठे दिख गये बस मैने जिद्द की कि मुझे तो ऊंटो के बच्चों से बात करनी है.  .वहां कार भी भयानक गर्मी मे गर्म हो चुकी थी. बस ताई ने वहीं कार रोक दी और वहीं कार को तो बोनट खोल कर खडा किया..और हम भी वहीं रुक गये.  ….अब आप फ़ोटो मे किसको पहचान रहे हैं? …पर  आप इसमे रामप्यारी को ढूंढ कर बताओ तो जानूं?

 

और मैने तय कर लिया है कि मैं अब अपने ब्लाग पर नियमित लिखूंगी और ये सब ताऊ और ताई के साथ की गई मेरी यात्राओं के बारे मे होगा? क्या खयाल है आपका? रामप्यारी का ये आईडिया कैसा लगा आपको?

Saturday, May 9, 2009

रामप्यारी हिंट लेकर आगई.

रामप्यारी की रामराम.

हाय आंटीज, अंकल्ज एंड दीदी लोग..वैरी गुड एंड शक्कर जैसी  स्वीट मार्निंग फ़्रोम रामप्यारी…कैसे हैं आप लोग?  मैं कैसी हूं?….अरे मेरा क्या पूछ रहे हैं? ..वो क्या है ना रामप्यारी की  तो पांचों अंगली घी मे और सर कडाही मे.  अपने तो मजे ही मजे हैं.

 

अभी इसी साल मार्च मे होली पर  मैं ताई के साथ उसके मायके चली गई थी.  अब आप पूछेंगे कि रामप्यारी तू ताई के साथ क्युं गई थी?

 

अरे यार…आप लोग इतना भी नही जानते कि ताई अकेली कैसे जायेगी?  ना उसको ट्रेन मे बैठना आता है और ना हवाई जहाज में.  बस इसीलिये सब जगह मुझे साथ ले जाती है.  अब ये सारे काम तो मुझे ही करने पडते हैं ना.  खैर ये सब बातें कभी बाद मे बताऊंगी.

 

ताई के मायके मे मैने बहुत अच्छी २ चीजे देखीं  वहा पर ना उनके बहुत बडे बडे खेत हैं…और उसमे चने और सरसों और गेहुं के खेत खडे थे. मैने तो उन खेतों मे खूब धमाचोकडी मचाई.  वहां ताई ने मुझे डांटा भी था कि – रामप्यारी खेतों मे इस तरह उछल कुद मत कर…तेरे को लग जायेगी…

 

 

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अब ना वहां बहुत सारे बच्चे थे…अरे गांव के बच्चे नहीं…मेरे मामाओं के बच्चे….सच्ची ना…झूंठ नही नही बोलती….मेरे एक दो नही पूरे छ:  मामा हैं और सारे के सारे फ़ौजी…दो रिटायर होकर आगये….

 

एक दिन मामा ने सारे बच्चों को और मुझे ना …मुझे ना…फ़ौजियों वाली ड्रेस पहना कर,   साथ लेकर बोले – चल रामप्यारी तू यहां पहली बार आई है..तु इन खेतों मे ही घुसी रहती है.  चल तुझे हवाईजहाज दिखा कर लाता हूं.

 

मैने कहा – मामा, हवाईजहाज का क्या देखना? मैं और ताई तो उसी मे आये हैं.

 

तो मामा बोले – रामप्यारी हवाईजहाज तो वहां ऐसे ही बहुत सालों से खडा है. हमने बचपन मे वहीं पर हवाईजहाज देखा था.  उस जमाने मे देखना ही बडी बात थी, बैठने की तो क्या बात करती है?  पर वहां इससे भी  ज्यादा चीजें देखने को मिलेंगी.

 

अब हम जैसे ही वहां पहुंचे मै तो उस हवाई जहाज के पंखे पर उचक कर चढ गई.  फ़िर मामा बोले रामप्यारी जरा आराम से..कहीं चोट न लग जाये. और वहां से फ़ोटू खिंचवा कर हम भीतर गये.

 

 

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भीतर ना..एक सुरंग सी थी..उसमे उतरने के बाद ना..ऐसा लगा कि किसी कोयले की खदान मे आगये हों?  और ना…और ना…वहां पर बहुत सारे मशीनों और  ईंडस्ट्री के माडल्स भी थे.  जो सच्ची मुच्ची चलते हुये दिखाई देते थे.

 

मैने फ़ौजी मामा से पूछा  -  मामा ये सब क्या है?  तो मामा ने बताया कि रामप्यारी इसको म्युजियम कहते हैं और ये सब देखने सीखने से ज्ञान बढता है.

 

बस मैने भी खूब ज्ञान बढाया अपना और फ़िर शाम को ही हम लोग वापस मामा के फ़ार्म हाऊस पर चले गये.

 

अगले दिन ना ..हम एक मंदिर मे गये जहां माता सरस्वती की मी मुर्ति थी और उस मंदिर का नाम भी सरस्वती टेम्पल था.

 

मैने पूछा कि ये क्या होता है?  तो फ़ौजी मामा ने बताया कि इस मंदिर मे दर्शन करने से बुद्धि तेज हो जाती है.  पर रामप्यारी तेरी बुद्धि तो पहले से ही बहुत तेज है अब और ज्यादा तेज मत कर लेना.

 

फ़िर हम घर आगये और अगले दिन घर पर ही रुद्र अभिषेक करवाया गया.  वाह क्या बढिया था पंचामृत और परसाद.

 

अब ना मैं अगले साल भी ताई के साथ वहां जाऊंगी.

 

अब मैं तो खाना खाकर दो घंटे सोऊंगी.  गर्मी ज्यादा है…फ़िर अब मैं कल रिजल्ट मे आपको ताऊ के ब्लाग पर मिलूंगी.  तब तक रामप्यारी आपको नमस्ते करती है.



और एक बात चुपचाप आपके कान में बता देती हूं. आपको विद्यामाता की कसम है, किसी को और खासकर ताऊ को मत
बताना कि मैने बताया है आपको...ताई का मायका राजस्थान मे है.

Saturday, May 2, 2009

रामप्यारी की बात सुनिये

हाय आंटीज, अंकल्ज एंड दीदी लोग..गुड वैरी स्वीट मार्निंग फ़्रोम रामप्यारी…

 

वो क्या हुआ ना कल हमारे पडोस मे रहने वाले अंक्ल को निमोनिया हो गया.  और एक दूसरे अंकल को सांस लेने मे परेशानी होने लग गई थी. दोनो को डाक्टर के पास मैं ही लेकर गई थी क्युंकी उनके घर पर तो कोई भी नही था.  अब सारे दुनिया जहान के सर दर्द तो आखिर रामप्यारी के लिये ही हैं ना.

 

वहां डाक्टर बोला कि ये दोनों एयर कंडिशनर की वजह से बीमार हुये हैं. लो बोलो..ये भी कोई बात हुई?

 

मैने कहा – डाक्टर अंक्ल इलाज आता हो तो करो पर इतनी ऊंची २ भी मत फ़ेंको.

 

अब डाक्टर मेरी मूंह की तरफ़ देखने लगा और बोला – रामप्यारी मैं सही कह रहा हूं.  ये तेरे पहले अंक्ल ने शायद एसी की सर्विस नही करवाई इसलिये टेमपरेचर ज्यादा गिर गया और दुसरे अंक्ल भी उसमे जमा धूल और फ़ंगस इन्फ़ेक्शन का शिकार हैं.

 

मैने पूछा – डाक्टर ओ इससे क्या होता है?

 

डाक्टर बोला – रामप्यारी , एसी की सही सर्विस करवाना चाहिये. और एसी की सफ़ाई नही होने से उसमे धूल जमा हो जाती है और उसमे ही फ़ंगस भी पैदा हो जाती है जो एसी की हवा से निकल कर हमारे नाकों मे जाकर नेजल इलर्जी, साईनोसाईटिस, स्किन फ़ंगस डिसीजौर अस्थमा, मायकोसिस एलर्जी हो सकती है जो कि निमोनिया की तरह ही होती है.

 

मैने कहा – डाक्टर मैं तो अब एसी मे नही रहूंगी, और ताऊ ताई को भी मना कर दूंगी.

 

डाक्टर बोला – नही रामप्यारी, एसी मे रहने मे बुराई नही है पर उसकी साफ़ सफ़ाई का पूरा ध्यान रखना चाहिये. और भी क्या पता कितना कुछ डाक्टर ने लेक्चर दिया. पर मैं तो अब भूल गई..अगर याद आया तो अगली बार बता दुंगी..और अब किस किस चीज की सफ़ाई का ध्यान रखें?  आजकल तो नलों मे बिल्कुल काला पानी आरहा है. अब क्या करे उबाल छान कर पी रहे हैं. बीमार होंगे तो डाक्टर अंकल की फ़ीस और मोटे २ इंजेक्शन खाओ.

 

खैर कोई बात नही. पर हम थोडा साफ़ सफ़ाई का तो ध्यान रख ही सकते हैं ना?

 

हां वो क्या कहते हैं ? अब क्या पता..ताऊ बोलता तो है कभी कभी…प्रिवेंशन इस बेटर देन क्योर..? सही बोली क्या मैं?

 

अच्छा तो इब रामराम. आप क्युं मुझसे बकबक करवाते रहते हैं. अब मैं तो जा रही खेलने आप भी अपना काम किजिये.

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