मिस. रामप्यारी के ब्लाग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

Saturday, May 23, 2009

आगई..आगई..रामप्यारी हिंट ले के आगई.

नमस्ते आंटीयों, अंकलों और दीदीयों.


अभी कुछ समय पहले मैं ताऊ के साथ गई थी हैद्राबाद. वहां पर मैने एक बहुत बडा म्युजियम देखा. उस म्युजियम का नाम था सालारजंग म्युजियम. और अंकल उसमे ऐसी ऐसी चीजे देखी की कि अब मैं आपको बताने बैठी तो आपके क्ल्यु तक पहुंच पाना ही मुश्किल हो जायेगा.


मेरे को वहां की एक चीज जरुर याद है. वहां एक घडी यानी दीवार घडी थी. जब भी घंटा पूरा होता उसमे से एक आदमी निकल कर आता और हथौडा उठाकर जितने बजे हों उतने घंटे बजाता. मुझे तो इस खेल मे बहुत मजा आया. ताऊ और ताई तो पता नही वहां घूम घूम कर क्या क्या देखते रहे. पर मैं तो सारे समय इसी के मजे लेते रही.


अब हम हैद्राबाद से विशाखापट्टनम चले गये. और वहां से इस जगह के लिये ट्रेन से निकले. करीब होगी यही कोई ५ या छ घंटे की यात्रा. आहा…कितना मजा आया इस यात्रा मे? हमारी रेलगाडी रास्ते मे इतने पुलों पर से गुजरी की क्या बताऊं? और बोलो…कम से कम आधा सैकडा गुफ़ाएं भी पडी थी. जिनमे से होकर हमारी रेलगाडी गुजरी थी. बस मुझे तो मजा आगया.



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फ़िर इन गुफ़ाओं से निकल कर हमारी गाडी एक स्टेशन पर पहुंची..पता नही स्टेशन का क्या नाम था? अब स्टेशन था तो कुछ नाम भी होना चाहिये? हां शायद कोई सा गुहालू या वुहालू ..ऐसा ही कुछ नाम था उस स्टेशन का. आप चिंता मत करो. मैं याद करके अगली पोस्ट मे २:३० बजे आपको बता दूंगी.


अब हम वहां से सीधे पहुंच गये इन गुफ़ाओं मे.

paheli23-clue-2 (1)


और हां..इन गुफ़ाओं मे करीब ३५० सीढियां उतरनी पडती हैं. और फ़िसलन भी बहुत ज्यादा. मैं तो एक बार फ़िसल ही गई थी. पर अंकलों और आंटियों फ़िसलने से रामप्यारी को कोई फ़र्क नही पडता. पर आप जरा देखकर …बुढ्ढे अंकलों और आंटियों आप माफ़ करना…अगर इस उम्र में हड्डी चटक गई तो फ़िर जुडने वाली नही है. फ़िर कहते फ़िरोगे कि ये रामप्यारी भी कहां कहां घुमाती रहती है? शाश्त्री अंकल आप सुन रहे हैं ना? और ताऊ को भी समझा देना.


अब अगले बुलेटिन मे २ :३० बजे रामप्यारी आपको फ़िर मिलेगी.

तब तक के लिये रामराम.

6 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रामप्यारी, धन्यवाद! बहुत बहुत तुम्हारी वजह से समय नहीं लगा पहेली का जवाब देने में।

विनोद कुमार पांडेय said...

धन्यवाद,खाली खाली बैठा बोर हो रहा था,
कही जाने का मन हो रहा था,
तैयारी मे ही था की, आपकी हिंट आ गयी,
और दर्शनीय सालारजंग म्यूज़ियम की झलक दिखा गयी.

अन्तर सोहिल said...

थैंक्यु प्यारी-प्यारी रामप्यारी
वैसे आज मैने तेरे कल्यु देने से पहले ही ताऊ की पहेली का जवाब दे दिया था। और तेरे सवाल का भी जवाब दे दिया है।

मीत said...

तेरी मलाई पक्की इस हिंट के लिए...
मीत

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

प्रिय रामप्यारी जी बेहतरीन यात्रा विवरण दिया है क्या कहने .

Udan Tashtari said...

बेटा रामप्यारी,

आजकल अंकल आंटी बोलना मना है. ऐसे कहो-शास्त्री, सुन रहे हो.

अटपटा लगा क्या? लगा न!!

बिल्ली है न तू, इसलिए मासूम है..हम इन्सानों को बुरा लगना बंद हो गया है यह सब.

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